रणांगण - रचयिता डी. बी. जगत्पुरिया

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Publisher: Prime Publishing House
ISBN: 9789395596404
Year: 2025
Pages: 74

चिंतक प्रतिभा की ऊर्जावान कविता!

डी. बी. जगत्पुरिया के ‘रणांगण’ संग्रह की अनुदित कविताओं में रचनात्मक ऊर्जा, संवदेना एवं वैचारिक पक्षधरता की त्रिवेणी प्रवाहित है| कवि को भूखे मन की व्याकुलता का क़यास है, जनता की आँखों के आँसुओं का एहसास है और शोषित, पीड़ित लोगों के प्रति गहरा आभास है| ये कविताएँ प्रजातांत्रिक व्यवस्था से जुड़े मूल्यों के नाम पर चल रहे ‘गड़बड़झाले’ को निरावृत्त करती चलती हैं तथा एक ऐसी व्यवस्था के विद्रुपों को उद्घाटित करने में प्रयासरत हैं, जो चालाकी और शोषण पर टिकी है| इन कविताओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तार्किकता, चिंतन और पैनी परख होना कवि को बधाई का पात्र बनाता है|
मानव जीवन के हरेक क्षेत्र से जुड़े हुए अनुभवों को कविताओं की विषयवस्तु बना कर कवि ने अपनी सुदीर्घ काव्य-प्रतिभा का निचोड़ प्रस्तुत किया है| ये कविताएँ जीवन का काव्यात्मक अनुवाद हैं जो संवेग व संघर्ष की उस क़लम से लिखी गईं हैं, जिस में यथार्थता अपनी पूरी गरिमा के साथ उपस्थित है| मनुष्यता को खोजने की चाहत लेकर कविअनुभूतियों के आसपास वैज्ञानिक ढंग से अपना काव्य-भूगोल रचते हैं, जहाँ हर शोषित चेहरा संघर्षरत नज़र आता है| मानवता की अपरिभाषेय ऊँचाई की तहक़ीक़ात करनेवाली एवं विषमताओं की विकरालता नापती ये अनुदित कविताएँ एक सार्थक-साहित्यिक सृजन हैं|

- डॉ. युवराज सोनटक्के
बेंगलुरु (कर्नाटक)

1. फरियाद
2. औदार्य
3. रणरागिनी
4. जाग उठा गाँव !
5. सत्त्व
6. साधना
7. हाँफ
8. गुढी
9. अनुबंध
10. पालनकर्ता के लिए
11. झुंड में बौने
12. मृत्यु : एक कटू चिन्तन
13. नाम विस्तार
14. टिप्पणियाँ नाम विस्तार की
15. बाबासाहेब
16. प्रज्ञासूर्य
17. ऊर्जा
18. मृदगंध
19. सुख संवाद
20. हे पुलिस मन !

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