प्राक्कथन में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है और उसे वाणी का वरदान प्राप्त है। वाक्शक्ति के माध्यम से वह अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों का आदान-प्रदान करता है। साहित्य इसी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, जो जीवन के सुख-दुख, संस्कृति और समाज के विविध पहलुओं को उजागर करता है। हिंदी साहित्य ने विभिन्न कालखंडों में समाज और संस्कृति का चित्रण किया है और साहित्यकार अपने युगीन परिवेश से जुड़कर उसे सृजनात्मक रूप प्रदान करता है।
हिंदी साहित्य भारतीय जीवन प्रणाली और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को सामने लाने में महत्वपूर्ण रहा है। इसमें नारी संस्कृति का सम्मान है, साथ ही अनिष्ट परंपराओं के बदलाव की पक्षधरता भी है। साहित्य मानव जीवन से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है क्योंकि यह उसकी रुचि का परिष्कार करता है और जीवन को समृद्ध बनाता है।
संस्कृति किसी राष्ट्र की अस्मिता की पहचान होती है। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है, जिसमें नैतिकता, अध्यात्म, दर्शन, परोपकार और शौर्य जैसे मूल्य निहित हैं। हिंदी साहित्य ने इन मूल्यों को आत्मसात कर स्वर्णिम साहित्य का रूप लिया है।
लेखक ने इस पुस्तक की रचना में परिवार और विद्वानों के सहयोग को मान्यता दी है। प्रस्तुत ग्रंथ से शोधकर्ताओं और छात्रों को हिंदी साहित्य के सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों का गहन अध्ययन करने का अवसर मिलेगा।
अनुक्रमणिका में अनेक महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं, जैसे भक्तिकालीन साहित्य, संत कबीर, रामधारी सिंह दिनकर, प्रेमचंद, भीष्म साहनी, स्त्री-विमर्श, और भारतीय संत साहित्य।
1. भक्तिकालीन साहित्य में सामाजिक, सांस्कृतिक चित्रण
- डॉ. पोपट भावराव बिरारी
2. निर्गुण कवियों की काव्य-भाषा और प्रतीक विधान
- प्रो. डॉ. अनीता रानी कन्नौजिया
3. भक्तिकालीन संत कबीर के काव्य में नारी
- डॉ. नामदेव ज्ञानदेव शितोळे
4. संत रविदास की जीवन दृष्टि
- प्रा. डॉ. ऐनूर शब्बीर शेख
5. निर्गुण भक्ति काव्य परंपरा के संत कवि गुरुनानक देव
- डॉ. दिपाश्री कैलास गडाख
6. रहीम के नीति काव्य में अभिव्यक्त मनुष्य जीवन
- प्रा. पठाण रईसा
7. हिंदी उपन्यास साहित्य में सामाजिक चेतना
- नवल कुमार पाठक
8. हिंदी साहित्य में आदिवासी समाज का चित्रण
- डॉ. संजीव कुमार विश्वकर्मा
9. हिंदी उपन्यास साहित्य में सामाजिक आयाम
- डॉ. अमलपुरे सूर्यकांत विश्वनाथ
10. हिंदी साहित्य में स्त्री अस्मितामूलक विमर्श
- प्रा. डॉ. भरत शेणकर
11. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के काव्य में राष्ट्रीयता
- डॉ. योगिता अपूर्व हिरे
12. जयशंकर प्रसाद के साहित्य में समाज और संस्कृति
- आशीष कुमार
13. मन्नू भंडारी की कहानियों में नारी संवेदना
- डॉ. अवधेश कुमार मेहता
14. प्रेमचंद के उपन्यासों में सामाजिक विसंगतियों पर प्रकाश
- डॉ. बिहारी लाल द्विवेदी
15. भीष्म साहनी की कहानियों में सामाजिक संवेदना
- डॉ. पार्वती कच्छप
16. यशपाल के उपन्यासों में सामाजिक समस्याओं का चित्रण
- डॉ. नीना मेहता
17. शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं में मानवीय संवेदना
- हरिमोहन गुप्ता
18. मध्यमवगय जनचेतना के कवि : रघुवीर सहाय
- डॉ. ओम प्रकाश सैनी (डी. लिट्)
19. ‘रश्मिरथी’ काव्य का सामाजिक निहितार्थ
- डॉ. राणा प्रताप तिवारी
20. ‘लौटे हुए मुसाफिर’ उपन्यास में चित्रित सामाजिक परिवेश
- डॉ. जिनु जॉन