हिंदी साहित्य में चित्रित समकालीन विमर्श

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Publisher: Prime Publishing House
ISBN: 9789395596916
Year: 2025
Pages: 200

प्राक्कथन में यह स्पष्ट किया गया है कि हिंदी साहित्य समकालीन विमर्शों को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है। आज समाज का वह वर्ग जो वंचित है, अपने अधिकारों और अस्मिता की पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है। साहित्यकारों ने स्त्री, दलित, आदिवासी, किन्नर, किसान, बालक, वृद्ध और पर्यावरण जैसे ज्वलंत विषयों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया है। इस दृष्टि से ‘हिंदी साहित्य में चित्रित समकालीन विमर्श’ यह पुस्तक अत्यंत उपयुक्त सिद्ध होती है।

इक्कीसवीं सदी को विविध विमर्शों की सदी कहा जा सकता है। स्त्री-विमर्श सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बना है, जिसमें स्त्री अपने अधिकार और स्थान की मांग करती है। दलित-विमर्श दलितों की पीड़ा और सामाजिक अन्याय को सामने लाता है। आदिवासी-विमर्श उनकी भाषा और संस्कृति के अस्तित्व संकट को उजागर करता है। किन्नर-विमर्श उनकी सामाजिक अपेक्षाओं और संवेदनाओं को अभिव्यक्त करता है। किसान, बालक और वृद्धों की समस्याएँ भी साहित्य में गहराई से चित्रित हुई हैं।

इस पुस्तक में समकालीन विमर्शों का बहुआयामी अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, चित्रा मुद्गल, मृदुला गर्ग, त्रिलोचन जैसे साहित्यकारों की रचनाओं में इन विमर्शों की झलक मिलती है।

लेखिका ने इस ग्रंथ की रचना में परिवार और विद्वानों के सहयोग को मान्यता दी है। प्रस्तुत पुस्तक शोधकर्ताओं, छात्रों और हिंदी साहित्य में रुचि रखने वालों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगी।

1. हिंदी साहित्य में समकालीन विमर्श का स्वरूप
- डॉ. पोपट भावराव बिरारी
2. दलित कविताओं में अभिव्यक्त नारी प्रतिरोध
- डॉ. जिषा एम. एन.
3. हिंदी उपन्यास साहित्य में आदिवासी-विमर्श का चित्रण
- आशीष कुमार
4. हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श : परंपरा से परिवर्तन की ओर
- डॉ. श्वेत प्रकाश
5. अस्तित्त्व की तलाश में किन्नर
- डॉ. ओम प्रकाश सैनी (डी. लिट्)
6. साहित्य में अभिव्यक्त आदिवासी समाज का चित्रण
- डॉ. बिहारी लाल द्विवेदी
7. आदिवासी कवयित्रियों की कविताओं में समाज और प्रकृति चिंतन
- देवा बासफोर
8. हिंदी उपन्यासों में नारी दिव्यांग-विमर्श
- शशिकांत चिन्नेश्वर सैबे
9. हिंदी दलित साहित्य में नारी की स्थिति
- प्रो. डॉ. अनीता रानी कन्नौजिया
10. महादेवी वर्मा कृत निबंध संग्रह ‌‘श्रृंखला की कड़ियाँ‌’ में स्त्री-विमर्श
- डॉ. झुनुबाला खुण्टिआ
11. प्रेमचंद के ‌‘गोदान‌’ उपन्यास में कृषक-विमर्श
- दिगंत बोरा
12. मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में स्त्री की सामाजिक स्थिति का चित्रण
- हरिमोहन गुप्ता
13. चित्रा मुद्गल की कहानियों में कामकाजी नारी
- वी. मणि
14. सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानियों में स्त्री-चेतना
- सत्येन्द्र कुमार शेन्डे
15. मधु कांकरिया के ‌‘हम यहाँ थे‌’ उपन्यास में आदिवासी विमर्श
- प्रा. डॉ. वर्षा लिंबराज कांबळे
16. कुमार कृष्ण के काव्य में पर्यावरण संवेदना
- शगनप्रीत कौर
17. कथाकार ‌‘शानी‌’ के उपन्यासों में जनजातीय विमर्श
- अनुपम कुमार
18. मृदुला गर्ग कृत ‌‘उसके हिस्से की धूप‌’ में नारी चरित्रों का स्वरूप
- प्रा. डॉ. विष्णु गोविंदराव राठोड
19. मेहरुन्निसा परवेज की कहानियों में स्त्री-विमर्श
- प्रा. डॉ. ऐनूर शब्बीर शेख
20. ‌‘अलग अलग वैतरणी‌’ में चित्रित ग्रामीण जीवन की व्यथा-कथा
- प्रा. डॉ. मल्लिनाथ बा.बिराजदार

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