प्राक्कथन में संत काव्यधारा के दार्शनिक और सांस्कृतिक आधारों का विवेचन किया गया है। उपनिषदों का संतों के चिंतन, जीवन-दर्शन और काव्यधारा पर गहरा प्रभाव रहा है। आचार्य शंकर की विचारधारा ने संतों की साधना-पद्धति और भक्ति-भावना को दिशा दी। निर्गुण और सगुण दोनों ही संत कवियों ने यह प्रतिपादित किया कि जीव विशुद्ध ब्रह्मतत्त्व है और भिन्नता केवल माया या अविद्या की उपाधि है। संत साहित्य आज भी समाज को सही दिशा देने में सक्षम है।
संतों का हृदय करुणामय, निष्पाप और निःस्वार्थ होता है। उनका हर कार्य लोकहित के लिए होता है। संत साहित्य अपने युग की प्रासंगिकता का बहुमूल्य दस्तावेज है, जिसमें ईश्वर-भक्ति और लोकमंगल की भावना निहित है। यह साहित्य मानव को नैतिक मूल्यों के संस्कार देता है। संत परंपरा में आत्मा की अखण्डता, अद्वैत और अकथनीयता का प्रतिपादन शंकर-सिद्धांत के अनुरूप है। नाथपंथ का भी संत काव्य और दर्शन पर गहरा प्रभाव रहा है, विशेषकर योग-साधना की प्रधानता में।
संत संप्रदाय के विचार विश्वकल्याण के हैं। गुरु को ब्रह्म से भी महान माना गया है। संत साहित्य आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है और जीवन को संयम, त्याग, अहिंसा, सदाचार और परोपकार की दिशा देता है। समाज और साहित्य का गहरा संबंध है, और संत साहित्य समाज सुधार की भावना को प्रोत्साहित करता है।
भारत में भक्ति की लहर दक्षिण से उत्तर तक फैली। निर्गुण संत कबीर हों या सगुण रामभक्ति के तुलसीदास, कृष्णभक्ति की मीराबाई हों या सूरदास—सभी ने ईश्वर-भक्ति को महत्त्व दिया। संत साहित्य भारतीय संस्कृति से गहराई से जुड़ा है और विभिन्न भक्ति संप्रदायों के संतों ने इसे समृद्ध किया है।
लेखिका ने इस पुस्तक की रचना में परिवार और सहकर्मियों के सहयोग को मान्यता दी है। प्रस्तुत ग्रंथ से शोधकर्ताओं और छात्रों को संत साहित्य के विविध आयामों का परिचय मिलेगा और यह अध्ययन के लिए उपयुक्त सिद्ध होगा।