लोक-साहित्य भारतीय संस्कृति की आत्मा है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोकगीतों, लोककथाओं, कहावतों और नाट्यों के माध्यम से जीवन मूल्यों, परंपराओं और अनुभवों को संजोता है। यह पुस्तक ‘भारतीय लोक-साहित्य : विविध आयाम’ लोक-साहित्य के स्वरूप, परंपरा, प्रकार, संकलन पद्धतियों और उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रासंगिकता पर गहन दृष्टि डालती है। इसमें विभिन्न राज्यों और भाषाओं के लोकगीतों, लोककथाओं और लोकनाट्यों का विवेचन किया गया है, जो भारतीय समाज की विविधता और एकता को उजागर करता है। पुस्तक में लोक-साहित्य के शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को सरल और प्रेरक शैली में प्रस्तुत किया गया है। यह संकलन छात्रों, शोधार्थियों, अध्येताओं और साहित्य प्रेमियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
1. लोक-साहित्य का स्वरूप
- डॉ. पोपट भावराव बिरारी
2. लोक-साहित्य की विशेषताएँ
- डॉ. देविदास भिमराव जाधव
3. लोक-साहित्य की परंपरा
- डॉ. मनोज कुमार
4. लोक-साहित्य के प्रकार
- प्रा. सोनू रमेश कोरी
5. लोक-साहित्य के संग्रह की आवश्यकता
- नवल किशोर अजगल्ले
6. लोक-साहित्य संकलन : उद्देश्य एवं पद्धतियाँ
- डॉ. अशोक अभिषेक
7. लोक-साहित्य के अध्ययन की चुनौतियाँ
- अनुपम कुमार
8. लोक-साहित्य की भूमिका और महत्व
- शेख हुसैन मैनोद्यीन
9. भारत के प्रसिद्ध परंपरागत लोकोत्सव
- डॉ. बिहारी लाल द्विवेदी
10. लोक कला और लोक-साहित्य : भारतीय संस्कृति की आत्मा
- डॉ. बिन्दु टी. आर.
11. लोक-संस्कृति एवं लोक-साहित्य
- डॉ. जिनु जॉन
12. लोकगीतों का स्वरूप एवं महत्व
- डॉ. पार्वती कच्छप
13. लोकगीतों की सामान्य प्रवृत्तियां एवं रूढ़ियाँ
- डॉ. मनिषा राजेश घरत
14. लोकगीतों का वगकरण
- डॉ. बिंदु कनौजिया
15. लोकगीतों में समाज प्रबोधन
- प्रा. डॉ. व्ही. व्ही. आर्य
16. छत्तीसगढ़ी लोक-साहित्य में लोक गीत का महत्व
- देवेन्द्र कुमार पटेल
17. हरियाणवी लोकगीतों में पारिवारिक रिश्ते-नाते
- डॉ. सुनीता देवी
18. लोकगायकों की भूमिका
- डॉ. सौरभ दवे
19. लोककथा का स्वरूप
- डॉ. बालस्वरूप द्विवेदी
20. लोकगाथा का स्वरूप
- हरिमोहन गुप्ता