{"product_id":"sahitya-men-manavatavad","title":"साहित्य में मानवतावाद","description":"\u003cp\u003eसाहित्य मनुष्य की संवेदनाओं, संघर्षों और आकांक्षाओं का सजीव प्रतिविंब है| वैश्विक असमानताओं, तनाव और उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों के युग में स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और न्याय जैसे मानवतावादी मूल्य अत्यंत आवश्यक हो उठते हैं| साहित्यकार इन मूल्यों को अपनी दृष्टि और अनुभवों से समृद्ध करते हुए समाज में करुणा, सह-अस्तित्व और नैतिकता की चेतना जाग्रत करते हैं|\u003cbr\u003eमानवतावाद वस्तुतः मनुष्य के सर्वांगीण कल्याण का विचार है, और साहित्य इसी विचार को संवेदना और विचारशीलता के माध्यम से सजीव बनाता है| निस्संदेह, मानवतावादी साहित्य हमारी परंपरा को समृद्ध करने के साथ आने वाले अध्येताओं के लिए प्रेरणा का सतत स्रोत बना रहेगा| मानवता की इसी अनदेखी को ध्यान में रखते हुए कवयित्री बहिणाबाई चौधरी यह सवाल पूछती हैं, ‘मानव तूंम कब मानव बनोगे’? इसलिए यह किताब इस मकसद से बनाई गई है कि यह पता लगाया जा सके कि आज़ादी, बराबरी, भाईचारा और सामाजिक न्याय के चार सिद्धांतों से बनी मानवतावाद की सोच को साहित्य में कैसे दिखाया गया है| यह मौलिक दस्तावेज़ जानकारों के लिए काम आएगा|\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: right;\"\u003e\u003cstrong\u003e- प्रा. विजय एल. माहेश्वरी\u003c\/strong\u003e\u003cbr\u003eकुलपति\u003c\/p\u003e","brand":"Prime Publishing House","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":52822765076799,"sku":null,"price":360.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0977\/4071\/8399\/files\/SahityaMenManavatavad_Hindi_1.jpg?v=1776859336","url":"https:\/\/primebookss.in\/products\/sahitya-men-manavatavad","provider":"Prime Publishing House","version":"1.0","type":"link"}